एक विदाई ऐसी भी! यहां शिक्षक की विदाई पर रोया पूरा गांव

एक शिक्षक ही मनुष्य को जिंदगी जीने के लिए सही दिशा दिखाता है। एक शिक्षक ही मुनष्य को सही और गलत का आइना दिखाता है। इसीलिए मनुष्य के जीवन में शिक्षक का दर्जा सबसे ऊपर होता है। जब शिक्षक अच्छे हों तो उनकी विदाई पर शिष्यों का रोना लाजमी है। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि एक शिक्षक की विदाई पर बच्चों के साथ-साथ पूरा गांव भी रोया हो? ये न तो कहानी है और न ही कोई खबर। ये हमारे समाज के लिए वो आइना है, जो किसी शिक्षक के कर्तव्य, संघर्ष, समर्पण और ईमानदारी को दर्शाता है।

इस शिक्षक ने 6 सालों में ऐसा कुछ कर दिया कि, जब उनकी विदाई हुई तो बच्चों समेत महिलाएं, किसान, अमीर-गरीब, बूढ़े सब रोए। इस कहानी से जुड़े जितने लोग भी हैं, शायद मुझसे बेहतर वो इसके बारे में आपको बता पाते। मेरे पास उस भावुक क्षण को शब्दों में पिरोने के लिए शब्द नहीं है। ये कहानी एक ऐसे शिक्षक की है, जिसके कर्मों ने पूरे गांव की आंखे नम कर दीं।

साल 2009 में अवनीश यादव ने इस कहानी की इबारत लिखी। जिस गांव में कोई भी शिक्षक जाने के कतराता था, उस समय अवनीश ने इस गांव में जाकर पढ़ाने का साहस दिखाया। अवनीश पहले दिन जब स्कूल पहुंचे तो उनको स्कूल का कमरा खाली मिला। पूरे स्कूल में सिर्फ 2 तीन बच्चे ही मिले। अवनीश ने शिक्षा के मंदिर की उस स्थिति को देखकर गांव और बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने की ठान ली।

इस इलाके में मजदूरों की संख्या ज्यादा थी, इसलिए लोगों को समझा पाना इतना थोड़ा मुश्किल था। बच्चे स्कूल आएं, इसके लिए अवनीश ने घर-घर जाकर लोगों से समझाना शुरू किया। इसके लिये अवनीश को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। आखिर देर से ही सही, लेकिन अवनीश की मेहनत रंग लाई। लोगों ने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया।

अवनीश के कुछ सालों के प्रयास से ही उस इलाके के बड़े-बड़े कान्वेंट स्कूलों को पछाड़ दिया। अवनीश ने अपनी मेहनत से बच्चों को इतना योग्य बना दिया कि कॉन्वेंट स्कूल के बच्चों से भी आगे निकल गये। अवनीश ने बभनौली में शिक्षा के बल पर ग्रामीणों की तकदीर बदलने का जो अभियान शुरू किया, वो लगातार आगे बढ़ता चला गया। अवनीश ने 6 सालों में पूरे बभनौली की तस्वीर बदल दी। इसका रिजल्ट ये निकला गांव के लोग अवनीश को अपने बेटे की तरह मानने लगे। उनका सरकारी स्कूल किसी कॉन्वेंट स्कूलों को मात दे रहा था। 

लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि अवनीश का तबादला हो गया। जब अवनीश की विदाई हो रही थी, तो नज़ारा कुछ ऐसा था जैसे किसी दुल्हन की विदाई हो रही हो। अवनीश की विदाई में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था। एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पूरा गांव रोया। अवनीश भी खूब रोये। पूरा वातावरण से सिर्फ सिसकियों की आवाज आ रही थी। सभी बच्चे बोल रहे थे, “मास्टर साहब आप हमें छोड़ कर मत जाओ, हम बहुत रोयेंगे।”आज जहां पूरे प्रदेश में प्राइमरी की शिक्षा अपने वजूद की तलाश रही है। शिक्षा का अधिकार होने के बाद भी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। ये कहानी शिक्षा से जुड़े हर उस शख्स के लिए एक आइना है जो शिक्षा का व्यवसायीकरणकरने पर तुले हुए हैं।

गुरु के महत्व पर संत सिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी रामचरित मानस में लिखा है-

गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जो बिरंचि संकर सम होई।।

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